‘चीन की निगाहें गलवन घाटी के कच्चे माल और बहुमूल्य खनिजों पर हैं’

वर्तमान में चीनी बोहोत सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं। वे बड़े पैमाने पर आर्थिक उपायों का उपयोग करते हैं, सैन्य शक्ति का नहीं। हालांकि, वे कभी-कभी सैन्य उपायों का भी उपयोग करते हैं, और उन्होंने एक विशाल सेना का निर्माण भी किया है।

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लद्दाख में होने वाली घटनाओं के बारे में सभी तरह की बातें कही जा रही हैं। प्रधान मंत्री ने शुरू में कहा कि भारतीय क्षेत्र में कोई घुसपैठ नहीं हुई है, लेकिन बाद में घाटी के सम्बन्ध में निर्विवाद तथ्यों के सामने आने  पर उन्होंहनेअपने बयान को बदल दिया I निसंदेह चीनी लदाख के गलवान घाटी, पांगोंग त्सो, हॉट स्प्रिंग्स आदि क्षेत्रों में घुस आये हैं, और इनको अपना क्षेत्र होने का दावा कर रहे हैं

आखिर क्या सच है?

इस बात का समझने के लिए मेरा लेख ‘ The Chinese are today’s Nazis ‘ ज़रूर  पढ़ें । चीन ने एक बड़े पैमाने पर अपने देश में औद्योगिक आधार बना लिया है अपने विशाल 3.2 ट्रिलियन डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार के साथ यह बाजार और कच्चे माल की तलाश करते हुए, लाभदायक निवेश के लिए नए रास्ते बना रहा है, जैसा साम्राज्यवादी देश करते हैं I

तिब्बत और लद्दाख जैसे पर्वतीय क्षेत्र साइबेरिया (Siberia) की तरह बंजर दिखाई देते हैं, लेकिन साइबेरिया की तरह वे बहुमूल्य खनिजों (valuable minerals)और अन्य प्राकृतिक संपदा से भरे हैं। यही कारण है कि चीन ने तिब्बत, और लद्दाख के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा भी कर लिया है। सलामी रणनीति ( salami tactics )का उपयोग करके , इसने हाल ही में गलवान घाटी, पैंगोंग त्सो, हॉट स्प्रिंग्स और लद्दाख के अन्य हिस्सों (1960 के दशक में अक्साई चिन पर पहले से ही कब्ज़ा कर लिया था ) पर कब्ज़ा कर लिया है। इन क्षेत्रों में मूल्यवान खनिज हैं, जिनकी चीन के बढ़ते उद्योग को आवश्यकता है, और यही हाल ही में हो रही सभी घटनाओं की वास्तविक व्याख्या है।

सभी को एक बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए कि राजनीति केंद्रित अर्थशास्त्र (concentrated economics) है, और इसलिए राजनीति को समझने के लिए इसके पीछे के अर्थशास्त्र को समझना ज़रूरी है।अर्थशास्त्र के कुछ लोहे की तरह सख्त कानून हैं, जो किसी भी व्यक्ति की इच्छा के प्रभाव से स्वतंत्र कार्य करते हैं।

उदाहरण के लिए, अंग्रेजों ने भारत को क्यों जीता? यह किसी पिकनिक के लिए या आनंद के लिए नहीं था। वास्तव में अंग्रेज़ों को यहां के गर्म मौसम से  बहुत तकलीफ़ थी। उन्होंने भारत पर विजय प्राप्त की क्योंकि उनके उद्योगों के एक निश्चित स्तर तक बढ़ जाने के कारण उन्हें विदेशी बाजारों, कच्चे माल और सस्ते श्रम की आवश्यकता थी।

इसी तरह, प्रथम विश्व युद्ध का कारण क्या था? यह दुनिया के उपनिवेशों के पुनर्विभाजन के लिए था। ब्रिटेन और फ्रांस ने पहले ही अपना औद्योगिकीकरण कर लिया था, और अधिकांश पिछड़े देशों को अपना उपनिवेश, यानी बाजार और सस्ते कच्चे माल और सस्ते श्रम का स्रोत बना लिया था। जर्मन औद्योगिकीकरण बाद में शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही यह ब्रिटिश और फ्रांसीसी को टक्कर देने लगा, और फिर जर्मनों ने  भी अधिक उपनिवेशों की मांग की। लेकिन ब्रिटिश और फ्रांसीसी उनके साथ उपनिवेशों का बटवारा करने के लिए तैयार नहीं थे, और इसके परिणामस्वरूप युद्ध हुआ।

जापान ने चीन और अन्य देशों पर आक्रमण क्यों किया? अपने बढ़ते उद्योग के लिए कच्चा माल और बाजार प्राप्त करने के उद्देश्य से!

इसी तरह, चीनी द्वारा बड़े पैमाने पर औद्योगिक आधार बनाए जाने के बाद उन्हें बाजार और कच्चे माल की आवश्यकता है, और इसने उन्हें साम्राज्यवादी बना दिया है। उन्होंने एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और यहां तक कि विकसित देशों में भी प्रवेश कर लिया है।

वर्तमान में चीनी बोहोत सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं। वे बड़े पैमाने पर आर्थिक उपायों का उपयोग करते हैं, सैन्य शक्ति का नहीं। हालांकि, वे कभी-कभी सैन्य उपायों का भी उपयोग करते हैं, और उन्होंने एक विशाल सेना का निर्माण भी किया है। वर्तमान में वे सलामी रणनीति का उपयोग करते हैं, कदम दर कदम आगे बढ़ते हैं। इस बात से यह पता चलता है कि हाल ही में गलावन घाटी और लद्दाख के अन्य स्थानों के कब्ज़े में आखिर क्या हुआ था। भविष्य में भी वे लद्दाख और अन्य भारतीय क्षेत्रों के हिस्सों को थोड़ा -थोड़ा कर उनपर कब्ज़ा करते रहेंगे, जाहिर है वहां पाए जाने वाले कच्चे माल और खनिज पदार्थों के कारण ।

यह बताया गया है कि 22 जून को भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल और चीनी सेना के मेजर जनरल के बीच वार्ता हुई, जिसमे हमारे लेफ्टनंट जनरल ने यह मांग की कि एक समय सीमा के अंदर दोनों सैनिक उस लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल जो चीनी घुसपैठ के पहले थी से २ किलोमीटर पीछे चले जाएँ  I दिक्कत यह है कि चीनियों ने कभी नहीं माना कि लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल क्या है, क्योंकि ऐसा मानने पर उनके विस्तारवाद पर बाधा लग जाएगा I

ऊपर बताई गयी सभी बातों को देखते हुए, यह समझना मुश्किल नहीं की इसकी बहुत कम संभावना है कि चीन इस मांग का अनुपालन करेगा।  बल्कि संभावना निश्चित रूप से यही है कि भविष्य में भी चीन धीरे धीरे हमारी सीमा के अंदर घुसपैठ करके आगे बढ़ता चलेगा  I

अब समय आ गया है कि हमारे नेताओं को इस बात का एहसास हो, और अमेरिका जैसे अन्य देशों के साथ हाथ मिलाकर चीनी विस्तारवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े हों। ठीक वैसे जैसे रूस, अमरीका, ब्रिटेन और अन्य देशों ने हिटलर के खिलाफ गठित होकर एक सयुंक्त मोर्चे का निर्माण किया था। यह हमारे और दुनिया के अन्य हिस्सों पर चीनी वर्चस्व को रोकने का एकमात्र तरीका है।

(इस लेख में व्यक्त की गई राय लेखक के अपने हैं और यह द रेशनल डेली के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करता है।)

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