in

भारतीय राजनीति में एक गठबंधन है जिसका नाम है – जाति धर्म गठबंधन

Representational Image
Representational Image

JNU की पूर्व प्रोफेसर सुधा पाई ने thewire.in में प्रकाशित एक लेख लिखा है, जिसका शीर्षक है ‘Rise of Tejashwi Yadav signals significant change in Bihar politics’। इस लेख में वह कहती हैं कि भारतीय राजनीति में अब केवल जातिगत संरेखण मायने नहीं रखता है, और बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि आदि जैसे कारक महत्वपूर्ण हो गए हैं। उन्होंने तेजस्वी यादव के बिहार चुनाव प्रचार के दौरान अपने भाषणों में इन अन्य कारकों का प्रभाव बताया I

क्षमा करें मैं प्रोफेसर सुधा पई की इस बात से असहमत हूं।

भारत अभी भी एक अर्ध सामंती देश है। यहाँ ज्यादातर लोग अभी भी पिछड़े सामंती मानसिकता के साथ जी रहे हैं, जातिवाद और सांप्रदायिकता से भरे हुए हैं। अधिकांश राज्यों में भारतीय चुनाव अभी भी काफी हद तक जाति और धर्म के आधार पर होते हैं। अधिकांश मतदाता अब भी केवल जाति और धर्म को देखते हैं जब वे वोट देने जाते हैं, और गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, उचित स्वास्थ्य देखभाल की कमी और जनता के लिए अच्छी शिक्षा, मूल्य वृद्धि, भ्रष्टाचार, आदि के प्रति पूर्ण तरह से उदासीन होते हैं।

अधिकांश भारतीय चुनावों में जो प्रासंगिक कारक है उसे जाति धर्म गठबंधन (CRA – Caste Religion Alliance ) कहा जा सकता है। क्यों की राज्य की आबादी की कोई भी जाति अपने आप में 10-12% से अधिक नहीं है, और चुनाव जीतने के लिए 30% से अधिक वोटों की ज़रूरत होती है जो केवल कई जातियों के गठबंधन से प्राप्त हो सकता है जो अक्सर मुसलमानों के साथ मिलकर संभव होता है (भाजपा को छोड़कर , जिसे मुसलमान वोट प्राप्त नहीं होते ) ।

उदाहरण के लिए – 1947 में आज़ादी के बाद उच्च जातियों (कई उत्तर भारतीय राज्यों में लगभग 16-17%) , मुसलमानों (यूपी में लगभग 16% और बिहार), और अनुसूचित जातियों (लगभग 20%) के CRA पर आश्रित कांग्रेस ने दशकों तक चुनाव जीते। बाद में, SCs ने अपनी पार्टी (BSP) बनाई, और दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, अधिकांश मुसलमान कांग्रेस छोड़कर यूपी और बिहार में RJD में शामिल हो गए, और उच्च जातियां भाजपा में चली गईं। इसलिए कांग्रेस बहुत कम मतों के साथ बची है, जिसके कारण कांग्रेस का बिहार में इस बार खराब प्रदर्शन रहा है।

वास्तव में जो हो रहा है वह कुछ यूं है कि जाति और धार्मिक गठजोड़ (CRA ) कभी-कभी बदल जाते हैं, लेकिन फिर भी चुनाव में प्रासंगिक कारक जाति और धर्म ही हैं, न कि बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि, स्वास्थ्य देखभाल की कमी, भ्रष्टाचार, आदि जैसे कि सुधा पाई ने बताया ।

बिहार चुनाव में उच्च जाति के हिंदुओं (आबादी का लगभग 16%) ने NDA (जो स्वयं को हिंदुओं का प्रतिनिधि कहते हैं ) को वोट दिया, साथ ही गैर यादव OBC (जो लगभग 40% आबादी का एक बड़ा वर्ग है) इस बात से पीड़ित थे की एक यादव मुख्यमंत्री के तहत केवल यादव जाती ( जो लगभग 12% होते हैं ) वाले अधिकारियों को ही अच्छी जगह तबादला मिलता है बाकियों को नहीं , जबकि अन्य OBC लोगों की अनदेखी होती है)।

महागठबंधन को 12% यादव वोट मिले, और शायद कुछ अन्य OBC वोट। अगर उन्हें 17% मुस्लिम वोट मिले होते तो वे चुनाव जीत सकते थे, लेकिन ओवैसी के AIMIM ने मुस्लिम वोटों को विभाजित कर दिया (एआईएमआईएम को 5 सीटें मिलीं और अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में सेंध लगाई)।

इसलिए सुधा पाई का यह विचार ग़लत है कि भारतीय चुनावों में बेरोजगारी और ऐसे अन्य कारक मायने रखते हैं। जब तक भारत अर्ध सामंती देश बना रहेगा तब तक यह स्थिति बनी रहेगी, और बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि आदि अप्रासंगिक रहेंगे।

इस लेख में व्यक्त की गई राय लेखक के स्वयं के हैं और ये The Rational Daily के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

Markandey Katju

Written by Markandey Katju

Justice Markandey Katju is the former Chairman, Press Council of India. Prior to his appointment as Chairman, Press Council of India, he served as a Permanent judge at the Supreme Court of India.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Representational Image

India’s politics has an alliance called – Caste Religion Alliance

Pakistan Map and Mohammed Ali Jinnah

The concept of Pakistan is fundamentally flawed