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फ़िर्दौस की दुर्दशा : कश्मीरियों और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में

Representative Image, Credit: DU Beat
Representative Image, Credit: DU Beat

कश्मीर का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध फ़ारसी दोहा है:

“अगर फिरदौस बर रू-ए-ज़मीं अस्त

हमीं  अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं  अस्त “

अर्थात –

“अगर स्वर्ग इस पृथ्वी पर मौजूद है,
तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है.”

आज वह स्वर्ग एक बुरे सपने में परिवर्तित हो गया है। 5 अगस्त, 2019 की घटना के बाद J &K सें  पूर्ण राज्य का दर्जा ले लिया गया, और कश्मीरियों को लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं  से वंचित कर दिया गया जैसे स्वतंत्र निर्वाचित विधायिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता आदि , अधिकांश राजनीतिक नेता अभी भी जेल में या घर में नज़रबंद हैं , कई प्रतिबंध अभी भी जारी हैं, और कश्मीरियों को 4G इंटरनेट से वंचित रखा गया है और उन्हें बीते हुए ज़माने का  2G इंटरनेट इस्तेमाल करना पड़ रहा है जिससे छात्रों, व्यापारियों, पेशेवरों, आदि को भारी कठिनाई हो रही है।

यदि अर्थव्यवस्था अच्छी होगी , तो समाज में आमतौर पर ज्यादातर चीजें अच्छी होंगी और इस कारण ऊपर कही गयी कठोरता कुछ हद तक सहनीय हो जाती है परन्तु अगर ऐसा नहीं है तो समझ जाना चाहिए की अँधेरे से भरा बुरा वक़्त आने वाला है। सच्चाई यह है कि आज कश्मीरी अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर जर्जर है, और बढ़ती बेरोजगारी, अशांति और उग्रवाद के  विकास का एक सुनिश्चित सूत्र है I

इन निम्नलिखित तथ्यों पर विचार करें:

5 अगस्त 2019 वह दिन था जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को समाप्त कर दिया गया , लेकिन साथ ही भारत सरकार ने घोषणा की कि कश्मीर का आर्थिक उत्थान होगा, कश्मीरियों को एक बेहतर और उज्जवल कश्मीर का सपना दिखाया गया था ।

कुछ दिनों में हम 5 अगस्त को उस घोषणा की पहली वर्षगांठ मनाएंगे, लेकिन वह मधुर सपना अभी तक सच नहीं हुआ है, बल्कि यह एक डरावने सपने में बदल गया है।  दिसंबर 2019 में, द कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने अनुछेद  के निरस्त होने के बाद के आर्थिक नुकसान पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें क्षेत्रवार डेटा विश्लेषण से कश्मीर के केवल10 जिलों में  17,500 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है, बाकी समस्त जम्मू और कश्मीर की तो बात ही और है।

भारत सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों द्वारा यह घोषणा की गई थी कि अनुच्छेद 35A के उन्मूलन के साथ भारतीय व्यवसायी जम्मू-कश्मीर में भूमि खरीद सकेंगे और वहां उद्योग और व्यवसाय स्थापित कर सकेंगे, इस प्रकार कई नौकरियां पैदा होंगी और कश्मीरी लोगों के लिए समृद्धि आएगी।इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया कि व्यवसायी केवल वहीं निवेश करेंगे जहां शांतिपूर्ण माहौल हो, न कि जहां परआतंकवाद हो और चारों ओर गोलियां चल रही हों।

2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू और कश्मीर  की साक्षरता दर देश में सबसे अधिक 67.16% होने के बावजूद, यह भारत में युवाओं की बेरोज़गारी में सबसे ऊपर आने वाले राज्यों में से एक है और तो और 2016 की अपनी राज्य आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 18-29 वर्ष की आयु वाले युवाओं की बेरोज़गारी में यह 24.6% है, जो कि अखिल भारतीय बेरोज़गारी दर से कहीं अधिक है। जम्मू-कश्मीर में 1.5 लाख पोस्ट-ग्रेजुएट छात्रों ने जून 2019 में केवल 15 दिनों में ही खुद को बेरोज़गार के रूप में रोजगार और परामर्श निदेशालय पंजीकृत किया । जबसे अगस्त में अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया  उसके बाद से और फिर COVID महामारी के लॉकडाउन के कारण हालात और बिगड़ते ही जा रहे हैं।

कश्मीर के कुछ हिस्सों में राजनीतिक अशांति और बड़ी संख्या में युवाओं  का  उग्रवादियों की श्रेणी में शामिल होने का कारण काम न मिलना है। जैसा कि कहावत है ‘मरता क्या नहीं करता’  एक बेरोज़गार युवक उग्रवादियों के लिए आसान निशाना  है। इसके कारण अस्थिरता पैदा होती है और राजनीतिक समस्याओं में बढ़ोतरी होती है, जो आगे चलकर भारत से अलग होने का भाव और शत्रुता पैदा करता है , इस प्रकार दुख और हिंसा का एक कभी न ख़त्म होने वाले चक्र का निर्माण होता है।

भारत में सीमावर्ती राज्यों के विकास का प्रमुख स्रोत सार्वजनिक निवेश या तो सीधे या CPSEs के माध्यम से होता है। जम्मू और कश्मीर में भारत के 339 CPSE में से केवल 3 हैं, जबकि कुल 1.08 मिलियन कर्मचारियों में से 21 को रोजगार मिलता है। निवेश की यह कमी क्षेत्र में बेरोज़गारी के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक है। हालांकि इस परिदृश्य को सुधारने के लिए बहुत कम कार्य किया गया है। उदाहरण के लिए अगर हम जम्मू-कश्मीर में बिजली आपूर्ति के मामले को देखें तो  NHPC (नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन) जम्मू और कश्मीर को उसकी सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक संपत्ति – उसके जल संसाधनों के लाभों से वंचित करता है।यह चोट अपमान के लिए कुछ बचता है तो उसके लिए,  जम्मू और कश्मीर अपने ही क्षेत्र में उत्पादित बिजली का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और इसे जितने में बेचा जाता है उस से लगभग दुगने दाम पर खरीदता है ।

जम्मू और कश्मीर में बागवानी और पर्यटन की व्यापक संभावनाएं हैं और दोनों आर्थिक समृद्धि के ‘इंजन’ हो सकते हैं लेकिन इस संबंध में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं किया गया है। जम्मू और कश्मीर भारत में 80% सेब का उत्पादक है और एकमात्र कारण है कि भारत दुनिया के शीर्ष 5 सेब उत्पादक देशों में से एक है। इस क्षेत्र से आधुनिक सेब की कटाई, भंडारण और परिवहन तकनीकों में अग्रणी होने की उम्मीद होगी लेकिन वास्तविकता इस से कहीं दूर है । भारत में 6000 कोल्ड स्टोरेज में से केवल 30  जम्मू और कश्मीर में पाए जाते हैं जो सिर्फ आधा  प्रतिशत है।

कश्मीर अपने सुगंधित केसर के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन इसके उत्पादन को बढ़ाने के लिए कोई समर्थन सरकार द्वारा नहीं दिया गया है। इसी तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर , पर्यटन और विपणन (marketing) को बड़े पैमाने पर अनदेखा किया गया है।

 उन कश्मीरी हस्तशिल्प उद्योग को न भूलें जो युगों से कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। नज़ाकत से तैयार किये गए पंख से भी हलके पश्मीना शॉल्स की तुलना में  घूमने वाले,  जटिल नक्काशीदार लकड़ी के काम, पेपर मशै के अद्भुत पैटर्न , उत्तम कालीन आदि को भारत और दुनिया भर में सराहा गया है। लेकिन मौजूदा हाल में आर्थिक संकट के मद्देनज़र , कश्मीरी अर्थव्यवस्था और उद्योग ध्वस्त हो रहे हैं। जम्मू और कश्मीर हस्तशिल्प (हैंडीक्राफ्ट्स) विभाग के अनुसार, 2019 की दूसरी तिमाही में हस्तशिल्प के निर्यात में 62% की गिरावट आई है।

वर्ष 2020 के मध्य में राज्य में बेरोज़गारी की उच्चतम दर दर्ज है, जो अगर कुछ स्रोतों की माने तो जुलाई 2020 में 70% तक है। सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा वर्ग -4 की नौकरियों (चपरासी की नौकरियों) के लिए विज्ञापन 8000 रिक्तियों ने 350,000 आवेदनों को आकर्षित किया था। राज्य की आबादी 12 मिलियन है जिसमें से 500,000 सरकारी कर्मचारी हैं (लगभग 100K सेवानिवृत्त कर्मचारी जो पेंशन पर रह रहे हैं) लेकिन बाकी के 11.5 मिलियन लोग एक आर्थिक दुःस्वप्न जी रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों में से एक, जेके बैंक, ( J&K Bank) ने स्टॉक एक्सचेंज में अपने शेयरों के मूल्य में तेज गिरावट देखी है, जो 2014 में 180 रुपये प्रति शेयर से घटकर आज 15 रुपये प्रति शेयर है, यानी 1200 % की गिरावट। यह एक सबल संकेत है कि कश्मीर की अर्थव्यवस्था बीमार हो गई है।

हम यह प्रस्तुत करते हैं कि अब समय आ गया है कि सभी संबंधित अधिकारी जागें  और स्थिति की गंभीरता को समझें , और कश्मीरी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए कठोर कदम उठाये , वर्ना  वह दिन दूर नहीं जब यह एक पूर्ण विकसित छापामार विद्रोह (guerilla insurgency)  में बदल जायेगा, ठीक वैसे जैसे वियतनाम या अफगानिस्तान ।

(इस लेख में व्यक्त की गई राय लेखक के अपने हैं और यह द रेशनल डेली के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करता है।)

Markandey Katju

Written by Markandey Katju

Justice Markandey Katju is the former Chairman, Press Council of India. Prior to his appointment as Chairman, Press Council of India, he served as a Permanent judge at the Supreme Court of India.

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